मन में जो रखा जाता है, वही उसकी सुगंध बनता है
मंगल सुत्त में मूर्खों से दूर रहना और बुद्धिमानों की संगति करना बड़ा मंगल कहा गया है।
जैसे कोई पात्र उसमें रखी वस्तु के अनुसार जल-पात्र, औषधि-पात्र, मधु-पात्र या कूड़ेदान बन जाता है, वैसे ही मन भी उसमें रखी बातों के अनुसार अपनी सुगंध बदलता है।
यदि मन क्रोध, ईर्ष्या या हानिकारक विचारों से भरा हो, तो उसका प्रभाव स्वयं और दूसरों को भारी करता है। यदि मन में करुणा, प्रज्ञा, कृतज्ञता और आशा हो, तो वही मन कोमल सुगंध फैलाता है।
इसलिए अभ्यास यह देखना है कि आज हम अपने मन में क्या रख रहे हैं, और किन संबंधों व कारणों के निकट रह रहे हैं।
आज मन में करुणा, प्रज्ञा, कृतज्ञता और आशा रखें, ताकि सुख और गरिमा स्वयं और दूसरों तक पहुँचे।
मंगल सुत्त मूर्खों से दूर रहने और बुद्धिमानों की संगति को बड़ा मंगल मानता है। पात्र में जो रखा जाए, उसकी सुगंध वैसी होती है; मन भी वैसा ही है। आज मन में करुणा, प्रज्ञा, कृतज्ञता और आशा रखें।