अपने भीतर के पंख स्वयं फैलाएँ
आज की शिक्षा एक आचार्य के छोटे वाक्य से शुरू होती है: पंख कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे दूसरे लगा दें; वह अपने भीतर से स्वयं निकलने वाली शक्ति है।
कभी-कभी हम प्रतीक्षा करते हैं कि कोई हमें उठाए, शक्ति दे और रास्ता खोले। पर असली शक्ति बाहर से लगाई नहीं जाती, वह भीतर से उगाई जाती है।
बौद्ध अध्ययन भी ऐसा ही है। मेरा मन मुझे ही सँभालना है, और उसे मुझे ही सीधे निखारना है। कोई दूसरा मेरी जगह उसे स्वच्छ नहीं कर सकता।
हमारे भीतर अभी पूरी तरह न खुली हुई क्षमता है। वह शक्ति एक रात में अचानक नहीं आती; वह आज की छोटी साधना और शुभ मनोभाव में धीरे-धीरे बढ़ती है।
आज किसी और से पंख मिलने की प्रतीक्षा करने के बजाय भीतर छिपी शक्ति पर भरोसा करें और साधना का एक कदम उठाएँ। जहाँ हम अपना मन स्वयं खड़ा करते हैं, वहीं जीवन थोड़ा हल्का होकर उड़ता है।
पंख कोई और नहीं लगाता; वे भीतर से उगने वाली शक्ति हैं। अपने मन को स्वयं सँभालना और निखारना होता है। हमारे भीतर अभी अनदेखी क्षमता है, इसलिए आज की छोटी साधना से उस शक्ति को बढ़ाना चाहिए।