मन के पाँच भावों से प्रज्ञा और सुख बनते हैं
आज की शिक्षा बुद्ध ने साधकों को बताए पाँच मनोभावों में संक्षेप की जा सकती है। जो मार्ग का अभ्यास और सिद्धि चाहता है, उसे पहले अटल श्रद्धा रखनी चाहिए।
दूसरा है ईमानदार प्रयास। शुभ संकल्प रखकर भी यदि हम साधना जारी न रखें, तो शक्ति नहीं जन्मती।
तीसरा है विचारों को उज्ज्वल और प्रसन्न रखना। मन अँधेरा और टेढ़ा हो तो साधना भी आसानी से भारी हो जाती है।
चौथा है मन का स्थिर और अडिग होना। बाहरी स्थितियाँ बदलें तब भी केंद्र न खोने की शक्ति चाहिए।
पाँचवाँ है मूर्ख न होकर प्रज्ञावान होना। इन पाँच भावों से साधक प्रज्ञा और सुख के निकट आता है। आज भी इन शर्तों को एक-एक कर मन में अंकित करते हुए प्रयास जारी रखें।
मार्ग को सिद्ध करने के लिए मन के पाँच भाव चाहिए: अटल श्रद्धा, सच्चा प्रयास, प्रसन्न विचार, अडिग स्थिरता और मूर्खता से मुक्त प्रज्ञा। इन पाँच भावों को विकसित करते हुए हम प्रज्ञा और सुख की ओर बढ़ सकते हैं।