शुद्ध मन निरंतरता का लक्ष्य है
विमलकीर्ति सूत्र में शिक्षा है कि यदि मन शुद्ध है, तो वही स्थान शुद्ध लोक है। शुद्ध मन प्रज्ञा के जन्म की भूमि है और जागरण की ओर बढ़ने का आधार है।
हम ध्यान और साधना से मन को सँभालना चाहते हैं। लेकिन मन को देखने पर विचार लगातार उठते और मिटते दिखते हैं। कभी-कभी चिंता भी होती है कि मन कब सँभलेगा, या जागरण कब होगा।
ऐसे समय आवश्यक उत्तर है: हार न मानकर प्रयास जारी रखना। जैसे तीरंदाज एक-दो बार तीर चलाकर ही लक्ष्य नहीं साधता, वैसे ही मन का अध्ययन दोहराव और निरंतरता में पकता है।
जल्दी न हो तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए। आज थोड़ा और पहचानें, कल फिर मन को देखें, और परिश्रमपूर्वक अभ्यास करते रहें; मन धीरे-धीरे स्थिर और निर्मल होता है।
आज भी मन के लक्ष्य की ओर एक और तीर छोड़ें। निरंतर प्रयास में शुद्ध मन बढ़ता है, और उसी मन में प्रज्ञा और सुख भी खिलते हैं।
शुद्ध मन प्रज्ञा और जागरण की भूमि है। मन को देखते समय अनेक विचार और चिंताएँ उठती हैं, पर जैसे तीरंदाज लगातार अभ्यास से लक्ष्य साधता है, वैसे ही हमें हार न मानकर साधना जारी रखनी चाहिए।