जो दिखता है उससे आगे सच्चे मन को देखें
ध्यान की शुरुआत में मन को देखने की बात अस्पष्ट लग सकती है। सचमुच बैठें तो तरह-तरह के विचार आते-जाते हैं, शरीर असुविधाजनक होता है, और भटके विचार व भ्रम अधिक बड़े दिख सकते हैं।
यदि उस समय दिखने वाले विचार और असुविधा को ही अपना पूरा स्वरूप मान लें, तो साधना जल्दी ही भारी लगने लगती है। पर जो दिखता है उसके पार एक और गहरा स्थान है।
साधारण भूमि जैसी दिखने वाली जगह के नीचे भी खोदने और देखने पर खजाना छिपा हो सकता है। मन भी ऐसा ही है। केवल विचारों की धारा मिटाने की कोशिश करने के बजाय, उसके नीचे के मूल मन-स्थान को जानना चाहिए।
लोग और परिस्थितियाँ भी केवल बाहरी रूप नहीं हैं। जो अच्छा दिखा उसमें दूसरा मन हो सकता है, और जो बुरा दिखा उसमें भी गहरा सत्य हो सकता है।
आज सामने दिखने वाले विचारों और भावनाओं को ही न पकड़े रहें। एक कदम और गहराई से देखें। साधना उन सबके पार सच्चे मन को खोजने का निरंतर प्रयास है।
ध्यान करते समय भटके विचार और शरीर की असुविधा पहले दिख सकते हैं, पर वे मन का पूरा रूप नहीं हैं। जो दिखता है उसके पार मूल सच्चा मन है। लोग और स्थितियाँ भी केवल सतह नहीं हैं, इसलिए गहराई से देखकर छिपे सत्य को खोजना चाहिए।