प्रतिदिन देखभाल हो तो प्रकाश आता है
आज की शिक्षा धम्मपद की एक छोटी शिक्षा से शुरू होती है। यदि हम न पढ़ें, तो शास्त्र के वचन भूल जाते हैं। यदि मरम्मत न हो, तो घर गिरता है। यदि धोकर देखभाल न की जाए, तो शरीर भी धुँधला पड़ता है। मन भी ऐसा ही है। यदि हम जागरूक न रहें और साधना न करें, तो प्रज्ञा का प्रकाश धीरे-धीरे मंद हो जाता है।
हम अक्सर साधना को केवल बड़े परिवर्तन के रूप में सोचते हैं। पर शास्त्र हमारे भीतर तभी रहता है जब हम उसे बार-बार पढ़ते और हृदय-मन में अंकित करते हैं। घर एक बार बन जाने से समाप्त नहीं हो जाता; रिसते स्थानों को ठीक करना और पुरानी जगहों को देखना पड़ता है। शरीर भी धुलने और सँभलने पर सहज रहता है।
मन की भी प्रतिदिन देखभाल करनी होती है। जब हम कुछ समय तक मन को नहीं देखते और निर्णयों व आदतों के साथ बह जाते हैं, तो जो पहले हल्का-सा धुँधलापन लगता है वह धीरे-धीरे प्रज्ञा को ढँक देता है। जागरूकता केवल विशेष दिनों के लिए नहीं है; यह प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा मन को साफ करने का काम है।
आचार्य ने कहा कि शास्त्र के वचन छोटे और सरल हैं, पर उनमें हम देख सकते हैं कि परिश्रम से साधना क्यों आवश्यक है। बार-बार पढ़ना, स्मरण रखना, शरीर और मन को सीधा रखना, और स्वयं को सँभालना - ये आदतें प्रज्ञा को उज्ज्वल करती हैं।
आज अपने जीवन के उन स्थानों को देखें जो देखभाल न होने से धुँधले हो गए हैं। क्या कोई शिक्षा पढ़नी है, कोई आदत सुधारनी है, कोई मन धोना है, कोई प्रज्ञा जगानी है? प्रतिदिन पढ़ना, शुद्ध करना और जागरूक रहना आज की साधना है।
शास्त्र न पढ़ा जाए तो भूल जाता है। घर की देखभाल न हो तो पुराना होता है। शरीर और मन को न सँभालें तो वे मंद पड़ते हैं। प्रज्ञा का प्रकाश अपने आप नहीं चमकता; प्रतिदिन पढ़ना, शुद्ध करना और जागरूक रहना मन को साफ करता है।