जितनी शक्ति बढ़े, मन को उतनी ही करुणा से सँभालना चाहिए
शक्ति बढ़ने पर मन को ठीक दिशा में रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि मन संकीर्ण हो, तो शक्ति केवल अपने लिए साधन बन जाती है। लेकिन करुणा हो, तो वही शक्ति अनेक लोगों का हित कर सकती है।
शक्ति अपने आप में न अच्छी है न बुरी। मुख्य बात यह है कि उसे चलाने वाला मन किस दिशा में है। यदि मन केवल अपने लाभ में अटका हो, तो शक्ति भारी होकर दूसरों पर बोझ बन सकती है।
करुणा होने पर हम स्वयं और दूसरों दोनों को देखते हैं। तब सहायता का द्वार खुलता है, और जो हमारे पास है वह लाभ पहुँचाने का कारण बनता है।
इसलिए अभ्यास हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग करने से पहले मन को विशाल करें। क्षमता, पद या प्रभाव जितना बढ़े, मन उतना ही कोमल और व्यापक होना चाहिए।
आज अपने पास की शक्ति का उपयोग विशाल और करुणामय मन से करें।
शक्ति बढ़ने पर मन को सँभालना महत्वपूर्ण हो जाता है। संकीर्ण मन में शक्ति केवल अपने लिए साधन बनती है, पर करुणा से वह अनेक लोगों का हित कर सकती है। आज अपनी शक्ति को विशाल मन से उपयोग करें।