जब हम मौलिक अर्थ जान लेते हैं, तो वाणी सही मार्ग बन जाती है
एक शिक्षा है कि जब हम शिक्षा के मूल उद्देश्य और मूल अर्थ को भली तरह समझ लेते हैं, तब वाणी की अभिव्यक्ति में भी दोष नहीं रहता। शब्द कभी-कभी लोगों को भ्रमित कर सकते हैं और शिक्षा को ढक सकते हैं, पर जागरण से निकले शब्द प्राणियों का मार्गदर्शन करने वाले कुशल उपाय बन जाते हैं।
महत्वपूर्ण यह नहीं कि शब्द अधिक हैं या कम, बल्कि यह है कि वे कहाँ से आते हैं। यदि मूल को जाने बिना केवल शब्दों से चिपकें, तो यह बादलों में छिपे सूर्य जैसा है। जब मूल और शब्द दोनों जाने जाते हैं, तो वह निर्मल आकाश के सूर्य जैसा उज्ज्वल होता है।
बुद्ध के शब्द साधारण व्याख्या नहीं हैं; वे प्रज्ञा पहुँचाने वाला मार्ग हैं। जब हम बोलें, तो ऐसे मन से न बोलें जो कहता है मैं सही हूँ, बल्कि ऐसे मन से बोलें जो दूसरे की सहायता करता है और सत्य को प्रकट करता है।
आज शब्दों पर ही न रुकें। देखें कि वे किस मूल अर्थ की ओर संकेत करते हैं, और सम्यक वाणी के साथ दिन जिएँ।
महत्वपूर्ण यह नहीं कि शब्द अधिक हैं या कम, बल्कि यह है कि वे कहाँ से आते हैं। मूल को जाने बिना केवल शब्दों से चिपकना बादलों में छिपे सूर्य जैसा है; जब मूल और शब्द दोनों जाने जाते हैं, तो वह निर्मल आकाश के सूर्य जैसा उज्ज्वल होता है। बुद्ध के शब्द प्रज्ञा पहुँचाते हैं, और हमारी वाणी को दूसरों की सहायता करनी चाहिए और सत्य प्रकट करना चाहिए।