अकुशल कर्मों से दूर रहें, दिन अच्छा बनता है
सुख और दुख की बात करते समय बुद्ध की शिक्षा पहले हमें दिखाती है कि दुख और असुख कहाँ से आते हैं। दुख का कारण जानेंगे तभी उसे रोक सकेंगे और उससे बाहर निकलने का मार्ग समझ सकेंगे।
सबसे सरल और महत्वपूर्ण शिक्षा है: हानिकर कर्मों से दूर रहो। हानिकर कर्म केवल शरीर से किए गए कर्म नहीं हैं; वे वाणी, विचार और मन की दिशा तक फैलते हैं। बुरी वाणी, बुरा व्यवहार और बुरे मन से दूर रहना दुख को रोकने का पहला कदम है।
जब हम हानिकर काम नहीं करते, उसी स्थान पर अच्छे काम किए जा सकते हैं। अच्छे विचार उठाएँ, अच्छी वाणी बोलें और अच्छे कर्म करते रहें, तो जीवन स्वाभाविक रूप से सुख के निकट आता है। सुख केवल बड़े प्रसंगों से नहीं आता; वह आज के छोटे चुनावों से शुरू होता है।
इन सबकी शुरुआत मन से होती है। मन की देखभाल न हो तो वाणी और कर्म भी बिखर जाते हैं। मन को ठीक से सँभालें तो वाणी और कर्म भी कुशल दिशा में चलते हैं। इसलिए अपने मन को बार-बार देखना और सँभालना आवश्यक है।
आज दुख से बचने का केवल बड़ा संकल्प न करें। अभी की अपनी सोच, वाणी और कर्म को शांत होकर देखें। हानिकर को घटाएँ और शुभ को बढ़ाएँ; तब आज का दिन अभी से अच्छा दिन बन सकता है।
दुख से बाहर निकलने का पहला कदम हानिकर विचारों, वाणी और कर्मों से दूर रहना है। जब हानिकर काम नहीं किए जाते, शुभ कर्मों के लिए स्थान बनता है। सबकी शुरुआत मन से होती है, इसलिए आज अपने मन को अच्छी तरह सँभालें।