जहाँ पुण्य इकट्ठा होकर धर्मकाय बनता है
आज की शिक्षा डोंगजी, शीत अयनांत, और शरीर पर चिंतन से शुरू होती है। डोंगजी वह मोड़ है जब रात सबसे लंबी होती है और उसके बाद दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं। जैसे लंबे अँधेरे के स्थान से फिर प्रकाश बढ़ना शुरू होता है, वैसे ही हमारा जीवन भी इस पर निर्भर करके नया बदल सकता है कि हम मन को किस दिशा में इकट्ठा करते हैं।
आचार्य ने कहा कि शरीर शब्द को हम एकत्र होने के अर्थ से भी देख सकते हैं। शरीर केवल मांस और हड्डियों से बनी वस्तु नहीं; यह अनेक कारणों और स्थितियों के मिलने से बना स्थान है। और गहराई से देखें तो साधना की अवस्थाओं के अनुसार, जो पुण्य इकट्ठा हुआ है उसे भी शरीर कहा जा सकता है।
इसलिए हमारा शरीर इस पर निर्भर करता है कि हम उसका उपयोग कैसे करते हैं। यदि हम बुरी आदतें और लोभ इकट्ठा करते हैं, तो वह उसी दिशा में कठोर होता है। यदि शुभ कर्म, साधना और अच्छा मन इकट्ठा करते हैं, तो यह अनमोल शरीर बनता है। जब हम शरीर और मन को साधते हुए पुण्य संचित करते हैं, तब यह शरीर केवल भौतिक देह से आगे बढ़कर धर्म को धारण करने वाला पात्र बनता है।
धर्मकाय कोई दूर की बात नहीं है। आज का एक शब्द, आज का छोटा शुभ कर्म, आज का पश्चात्ताप और प्रार्थना, आज की साधना - ये सब मिलकर धर्म का शरीर रचते हैं। जैसे डोंगजी पर लोग अशुभ ऊर्जा से दूर होकर नए प्रकाश का स्वागत करते हैं, वैसे ही हमें प्रतिदिन पुण्य जोड़कर स्वयं को प्रकाशित करने का मार्ग चलना चाहिए।
आज देखें कि आप इस शरीर को किससे भर रहे हैं। शिकायत और लोभ इकट्ठा कर सकते हैं, या शुभ मन और साधना भी इकट्ठा कर सकते हैं। थोड़ा पुण्य भी प्रतिदिन जुड़ता रहे तो शरीर और मन अधिक मूल्यवान होते हैं, और जीवन स्वाभाविक रूप से उज्ज्वल दिशा में बढ़ता है।
शरीर अनेक कारणों से बना स्थान है। साधना से देखें तो शुभ कर्म और पुण्य मिलकर धर्म को धारण करने वाला शरीर बनाते हैं। आज के छोटे शुभ कर्म और अभ्यास संचित कर इस शरीर और मन को अधिक मूल्यवान व उज्ज्वल बनाएँ।