अग्नि की शिक्षा जो भेद नहीं करती
आज की शिक्षा सर्दियों की सुबह मंदिर में लकड़ी की आग सँभालते समय उठे रूपक से शुरू होती है। ठंड के मौसम में कमरे को गर्म करने के लिए लकड़ी रखनी और आग को जीवित रखना पड़ता है। आग छोटी हो या बड़ी, वह अपने स्वभाव के अनुसार जलती है और ऊष्मा देती है।
आचार्य ने कहा कि आग का स्वभाव भेद न करने में है। आग महँगे और सस्ते, अच्छे और बुरे, मूल्यवान और सामान्य का हिसाब नहीं करती। जो कुछ आग से मिलता है, वह अपनी स्थितियों के अनुसार जलता है, और आग बिना भेदभाव अपना काम करती है।
बुद्ध की शिक्षा को भी इसी तरह देखा जा सकता है। शिक्षा केवल पद, ज्ञान, धन या परिस्थिति देखकर नहीं खुलती। जो कोई मन को सँभालता और साधना करता है, वह शिक्षा के गुण को ग्रहण कर सकता है। जागरण का मार्ग ऐसा द्वार नहीं जो सबके लिए बंद और केवल कुछ विशेष लोगों के लिए खुला हो।
फिर भी जैसे ऊष्मा महसूस करने के लिए आग के पास होना पड़ता है, वैसे ही शिक्षा तब जीवित होती है जब हम स्वयं मन खोलकर उसे आचरण में लाते हैं। अपने पात्र, अपनी साधना, और मन को जितना साधा है, उसके अनुसार हम उसका गुण अनुभव करते हैं। वह समान रूप से खुली है, पर उसे ग्रहण करना प्रत्येक व्यक्ति के मन और अभ्यास पर निर्भर है।
आज ऐसा हृदय याद करें जो स्वयं और दूसरे को शर्तों से विभाजित नहीं करता। कोई भी साधना कर सकता है, और कोई भी गर्म शिक्षा पा सकता है। उस समान मार्ग को याद रखते हुए आज मन को सँभालें और दिन को गर्माहट से जिएँ।
आग अपना ईंधन नहीं चुनती; वह अपने स्वभाव से जलती और ऊष्मा देती है। बुद्ध की शिक्षा भी स्थिति या शर्तें चुने बिना सबके लिए खुली है। फिर भी उस ऊष्मा को पाने के लिए हमें पास आना, मन साधना और शिक्षा को अभ्यास में लाना होता है।