'मैं जानता हूँ' कहने वाला मन अज्ञान की शुरुआत बनता है
साधना में जागरूकता महत्वपूर्ण है। पर जब हम जागरूकता के ऊपर 'मैं जानता हूँ' या 'मैं जाग गया हूँ' का विचार बना लेते हैं, उसी क्षण आत्म-दृष्टि उठती है और अज्ञान शुरू होता है।
शुद्ध जागरूकता केवल जानती है। जब हम उसमें स्वयं को जोड़ते हैं, तो भेद, तुलना, आसक्ति और पकड़ आ जाते हैं। इसलिए सही समझ के ऊपर एक और दृष्टि न बनाने की शिक्षा बहुत गहरी है।
ह्वाडु भी 'मैं' नामक मन को अंत तक देखने का कुशल उपाय है, ताकि जहाँ ह्वाडु भी विलीन हो जाए, वहाँ मूल जागरूकता प्रकट हो सके। उद्देश्य जानने वाले मन को आगे रखना नहीं, बल्कि केवल जानना स्पष्ट रहने देना है।
आज 'मैं जानता हूँ' की धारणा को आगे न रखें। शांत और प्रकाशमान जागरूकता से मन को देखें।
शुद्ध जागरूकता केवल जानती है। जब हम उसमें स्वयं को जोड़ते हैं, तो भेद, तुलना, आसक्ति और पकड़ आ जाते हैं। ह्वाडु 'मैं' नामक मन को गहराई से देखने का कुशल उपाय है, ताकि जहाँ ह्वाडु भी मिट जाए, वहाँ मूल जागरूकता प्रकट हो सके।