उस मन पर गहरा भरोसा करना जो मूलतः शुद्ध है
आज की शिक्षा एक वाक्य में निहित गहरे अर्थ को लंबे समय तक देखने से शुरू होती है। गहरे मन से यह मानना और समझना कि मूल मन सदा शुद्ध है, इस विश्वास की ओर ले जाता है कि मूल मन पहले से ही बोधि है। यह केवल अच्छे विचार सोचने का आग्रह नहीं, बल्कि मन के मूल स्थान पर दृढ़ भरोसा करने की साधना है।
दैनिक जीवन में जब मोह, भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ उठती हैं, हम जल्दी सोच लेते हैं कि मन मलिन हो गया। पर जैसे-जैसे यह भरोसा गहरा होता है कि मूल मन शुद्ध है, हम धीरे-धीरे देखते हैं कि आते-जाते विचार और परिस्थितियाँ मन को उसकी जड़ में दागदार नहीं करतीं। जैसे बादल की छाया गुजरने पर भी आकाश गायब नहीं होता।
यह भरोसा सहज नहीं उठता। आचार्य ने भी कहा कि सामान्य साधकों के लिए यह बहुत कठिन विषय है। इसलिए हमें अपनी मूल प्रकृति को और गहराई तथा स्पष्टता से देखना, बार-बार परखना, और उस स्थान पर भरोसा करने की शक्ति उगानी होती है।
खुले आकाश में आगे-पीछे, उत्तर-दक्षिण और लौटने की कोई जगह नहीं होती। जब हम मूल स्थान पर गहरा भरोसा करते हैं, कोई परिस्थिति हमें धर्म से बाहर नहीं धकेल सकती। सुखद क्षण और कठिन प्रतिक्रिया वाले क्षण, दोनों फिर से साधना के स्थान बन सकते हैं।
आज जो भी परिस्थिति आए, मूल मन की शुद्धता को न भूलने का अभ्यास करें। पूर्ण जागरण न भी हुआ हो, फिर भी जब हम हर अनुभव को मूल प्रकृति से जुड़ा मानकर ग्रहण करते हैं, साधना और प्रसन्नता उसी स्थान पर साथ खुल सकती हैं।
यह विश्वास कि मूल मन बोधि और शुद्ध है, आसान नहीं है, पर साधना का गहरा केंद्र है। विचार और प्रतिक्रियाएँ उठें तब भी मन अपनी जड़ में मलिन नहीं होता। जैसे-जैसे यह भरोसा गहराता है, हर स्थिति अभ्यास और प्रसन्नता का स्थान बन सकती है।