एक पल के लिए पीछे हटने की बुद्धिमत्ता
आज आचार्य ने इस कहावत से शिक्षा खोली कि गुजरती बरसात से कुछ देर बचना चाहिए। जब तेज बारिश आती है, न मनुष्य न पशु जानबूझकर उसके सामने खड़े रहते हैं। वे आश्रय खोजते हैं और शरीर को थोड़ी देर के लिए वर्षा से हटाते हैं। यह सीखा हुआ व्यवहार कम, प्रकृति द्वारा पहले से दिखाया गया सिद्धांत अधिक है।
ठंडे पर्वतीय आश्रम में भी ऐसा ही है। बर्फीली पहाड़ी हवा में खड़े रहने के बजाय गर्म कमरे में जाकर शरीर को विश्राम देना स्वाभाविक है। फिर भी हम अक्सर इस प्राकृतिक बुद्धि को पार कर जाते हैं। कई बार देखते हुए भी उससे नहीं सीखते और बिना ध्यान दिए जीते रहते हैं।
जीवन में भी यही होता है। जब दूसरा व्यक्ति बहुत क्रोधित हो और हम भी उसी क्षण उतने ही क्रोधित होकर टकराएँ, स्थिति बड़ी हो जाती है। बड़ी आग में तेल डालने की तरह दुख और समस्याएँ बढ़ सकती हैं। ऐसे समय गुजरती बरसात से बचने की तरह, हमें थोड़ी देर पीछे हटने की बुद्धि चाहिए।
कुछ समय के लिए हट जाना भागना या हार मानना नहीं है। इसका अर्थ है यह पहचानना कि अभी भिड़ेंगे तो स्थिति बिगड़ेगी, और उसे शांत होने का समय देना। इस तरह पीछे हटने पर बाद में हम अधिक स्पष्ट मन से बोल और उत्तर दे सकते हैं।
प्रकृति हमें जीने के उत्तर पहले ही दिखा रही है। हवा तेज हो तो हम शरीर को आश्रय देते हैं; बरसात आए तो छत के नीचे प्रतीक्षा करते हैं। आज अपने मन की स्थिति को भी ऐसे ही देखें। जो मन देखता है, देखभाल करता है, और थोड़ी देर पीछे हटना जानता है, वही शांत प्रतिक्रिया की शुरुआत है।
गुजरती बरसात या ठंडी हवा से कुछ देर बचना प्राकृतिक बुद्धि है। किसी के क्रोध या तीव्र परिस्थिति के सामने उसी तरह न टकराएँ; पीछे हटें और साँस लें। इस तरह देखेंगे तो अगले क्षण से अधिक शांतिपूर्वक मिल सकेंगे।