जब बैल लुप्त होता है, निरासक्त मन का अभ्यास शुरू होता है
दस बैल-पालन चित्रों में बैल के लुप्त हो जाने का दृश्य उस अवस्था की ओर संकेत करता है जहाँ मन को अलग वस्तु बनाकर पकड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। बैल को खोजना, देखना, पकड़ना और साधना एक प्रक्रिया थी; पर जब समझ आता है कि मन मूलतः कोई अलग वस्तु नहीं है, तो बैल मानो लुप्त हो जाता है।
जब हम दुखी मन को छोड़कर उसे खोजते हैं, तो पकड़ने योग्य मन नहीं मिलता। इसी तरह गहराई से देखने पर जिसे हम दुख मानते थे, उसमें कोई स्थिर सार नहीं मिलता। मन को अलग वस्तु बनाकर पकड़े रहने और उससे लड़ने का काम स्वाभाविक रूप से घटने लगता है।
फिर भी सावधान रहना चाहिए। यदि "मैं जाग गया" या "अब मेरी साधना समाप्त हो गई" जैसे विचार बचे रहें, तो वे भी एक और आसक्ति हैं। बैल का लुप्त होना अंत नहीं है; यहीं से और गहरा अभ्यास शुरू होता है।
निरासक्त मन का अर्थ कुछ न जानना नहीं है। यह वह स्पष्टता है जहाँ हम भेद और आसक्ति से घसीटे नहीं जाते और जीवन को स्वाभाविक रूप से जीते हैं। क्योंकि मन पकड़ में नहीं आता, जीवन अधिक सहज होता है और कर्म अधिक स्वाभाविक।
आज मन को अलग वस्तु बनाकर दुख न बढ़ाएँ। उठते हुए मन को प्रकाशित करें और निरासक्त मन की स्वाभाविक साधना में चलते रहें।
जब हम मन में गहराई से देखते हैं, तो पाते हैं कि हमसे अलग कोई स्थिर मन नहीं है जिसे पकड़ना हो। फिर भी "मैं जानता हूँ" का विचार भी आसक्ति बन सकता है। आज मन को पकड़े बिना स्वाभाविक जागरूकता में रहें।