लहरों से गहरे समुद्र को देखें
लंकाावतार सूत्र की शिक्षा में कहा गया है कि अनेक प्रकार की चेतना की लहरें आलय-विज्ञान के समुद्र में उठती हैं। समुद्र एक है, पर हवा चलने पर असंख्य लहरें उठती हैं। इसी तरह मूल मन के आधार पर विचार, भावनाएँ, भेद और कर्म की अनेक गतियाँ प्रकट होती हैं।
लहरें स्पष्ट उठती हैं, पर समुद्र से अलग नहीं होतीं। लहरें तीव्र हों तब भी समुद्र की गहराई मिटती नहीं। लहरें शांत हों तब भी समुद्र नया पैदा नहीं होता। हमारा मन भी ऐसा ही है।
जब हम आँख से किसी वस्तु को देखते हैं, उसे अच्छा या बुरा ठहराते हैं, और भाव तथा कर्म को उस निर्णय के पीछे चलने देते हैं, तब कर्म बनता है। पर यदि हम उसी क्षण को देख लें, तो लहरों में बहते नहीं और समुद्र की गहराई देख सकते हैं।
साधक को लहरों को मिटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए; उसे स्पष्ट जानना चाहिए कि लहर लहर है। महत्त्व इस बात का है कि "आज मन खुरदरा है" या "आज मन शांत है" यह देखे, और मूल गहराई को न भूले।
आज विचारों और भावनाओं की लहरों में न बहें; उनके नीचे के गहरे और शांत मन-सागर को देखते हुए दिन बिताएँ।
विचार और भावनाएँ लहरों की तरह उठती हैं, पर मूल मन गहरे समुद्र जैसा है। लहरों को हटाने की कोशिश करने के बजाय हमें देखना चाहिए कि वे उठती और मिटती हैं। आज मन के गहरे समुद्र को न भूलें।