अनित्यता जानने पर आज की साधना नहीं टालते
बौद्ध धर्म कहता है कि प्रत्येक दिन को बिना लाभ के व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। दिन का बीतना केवल समय नहीं है; वह जीवन का एक हिस्सा है जो लौटकर नहीं आता।
अनित्यता को गहराई से महसूस करें तो संसार मानो आग के भीतर दिखाई दे सकता है। समय बीतता है, शरीर बूढ़ा होता है, और किसी दिन हमें मृत्यु का सामना करना होगा।
इसलिए साधना बाद के लिए टालने की बात नहीं है। हर क्षण स्वयं को सँभालना, मन को देखना, और जागरूकता की आदत विकसित करना आवश्यक है। यही आग जैसी अनित्यता के बीच स्वयं की रक्षा का मार्ग है।
अनित्यता भय देने के लिए नहीं कही जाती। वह तो आज को अधिक मूल्यवान ढंग से जीने की शिक्षा है। ऋतु बदलते और पत्ते गिरते देखकर हम समझ सकते हैं कि अभी क्या करना है।
आज मन की देखभाल की छोटी साधना करें। श्वास को पहचानें, मन को स्थिर करें, और जागरूक होकर दिन जिएँ; तब बहता समय भी अध्ययन का मार्ग बनता है।
दिन को व्यर्थ न जाने देने की शिक्षा हमें अनित्यता जगाती है। समय बीतता है, शरीर बूढ़ा होता है, संसार कभी भी बदल सकता है। इसलिए साधना न टालें; हर क्षण मन की देखभाल करें।