मन शांत हो तो दुख की लहरें भी थमती हैं
धम्मपद में शिक्षा है कि जब मन शांत होकर स्वच्छ झील जैसा हो जाता है, तब वह संसार के प्रवाह से खिंचता नहीं। यह वचन साधना के सार को बहुत सरल रूप में दिखाता है।
हम श्वास लेते और छोड़ते हुए जीते हैं। साथ ही विचार भी लगातार उठते और मिटते रहते हैं। उन क्षणों को ध्यान से देखें तो उठने और मिटने का प्रवाह दिखता है।
जन्म और मृत्यु केवल दूर की बड़ी घटनाएँ नहीं हैं। विचार के उठने-मिटने में और श्वास के आने-जाने में भी उठने और मिटने का नियम सीखा जा सकता है।
भ्रम और विचार जितने अधिक होते हैं, मन की लहरें उतनी ही खुरदरी होती हैं। लेकिन श्वास को पहचानकर और विचारों को शांत होकर उठते-मिटते देखते हुए मन धीरे-धीरे बैठता और निर्मल होता है।
आज जटिल व्याख्या से अधिक, एक श्वास को पूरे मन से पहचानें। मन को शांत बैठाने का छोटा परिश्रम दुख से मुक्त होने के मार्ग की शुरुआत है।
मन शांत होकर बैठता है तो स्वच्छ झील जैसा हो जाता है। श्वास आती-जाती है, विचार उठते-मिटते हैं। इन क्षणों को पहचानने से उठने और मिटने का प्रवाह सीखा जाता है। श्वास और विचारों को शांत देखना साधना का महत्वपूर्ण मार्ग है।